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Showing posts with the label एह्सास

तलाश

उफ्फ!!! ये घना सा कोहरा फिर भी रास्ता स्थिर है! चल रहा है विचारो का मंथन उमीदे सजग है! एक सफेद चादर छाई है नभ में विचारो पर जैसे धूल जमी हो, एक और साल गुजर गया वक़्त को मानो पंख लगे हो, आकाँशा-ए बहुत है पर समय नही, उमीद है विचारो पर अब उनको जगाना है, वक़्त को मानो बंदी बनाना है, जो छूट गया उसे भूलाना है, इस घने कोहरे ने खुद को तलाश पाना है!! #AKA

Where are you?

वहा की धूप भी अच्छी लगती थी यहा के एसी मे भी आराम नही…… वहा घास पे बैठना भी अछा लगता था यहा चयर्स पे भी चैन नही…… वहा के समोसे भी स्वादिष्ट थे यहा के बर्गर मे भी स्वाद नही….. वहा की चाय भी मीठी लगती थी यहा की आइस टी मे भी मिठास नही….. वो ब्लू यूनिफॉर्म मे एक कॉन्फिडेन्स था आज जीन्स मे भी कंफर्ट नही….. वो ब्लॅक शूस मे जो बात थी वो आज अडीडस और नाइकी मे नही….. कॉलेज बस की आखरी सीट पे बैठ के गये हुए गानो की जैसे अब धुन भी याद नही….. अब बस सामने एक कंप्यूटर स्क्रीन है और हस्ने लायक कोई मज़ाक नही….. फॅकल्टी से लड़ते वक़्त ये पता भी न था की मॅनेजर के सामने कुछ बोल भी ना पाएँगे….. अब तो ये भी नही पता होता की ह्म वापस घर क्ब जाएँगे….. एक झूठी मुस्कुराहट लिए ह्म जैसे जी रहे है…. ज़िंदगी का कोई भी गम हो ओफीस के काम के साथ पी रहे है….. सुबह का एक मेसेज “आज नही चलते यार”…. अब “इट्स 9.30 Where are you?” मे बदल गया है….. पहले जिस हस्ती को लगभग पूरा कॉलेज जानता था…. आज वो एक क्यूबिकल मे सिमट के रह गया है….. पहले एक दूसरे की पार्टी मे जैसे बिल बढ़ाने जाते थे….. आज की पा...

चिंटू की लाइफ !!!

परेशान थी चिंटू की वाइफ नों-हॅपनिंग थी जो उसकी लाइफ चिंटू को ना मिलता था आराम ऑफीस मैं करता काम ही काम चिंटू के बॉस भी थे बड़े कूल प्रमोशन को हर बार जाते थे भूल पर भूलते नही थे वो डेडलाइन काम तो करवाते थे रोज़ टिल नाइन चिंटू भी बन ना चाहता था बेस्ट इसलिए तो वो नही करता था रेस्ट दिन रात करता वो बॉस की गुलामी ऑनसाइट के उम्मीद मैं देता सलामी दिन गुज़रे और गुज़रे फिर साल बुरा होता गया चिंटू का हाल चिंटू को अब कुछ याद ना रहता था ग़लती से बीवी को बहेनजी कहता था आख़िर एक दिन चिंटू को समझ आया और छोड़ दी उसने ऑनसाइट की मोह माया बॉस से बोला, "तुम क्यों सताते हो ?" "ऑनसाइट के लड्डू से बुड्दू बनाते हो" "प्रमोशन दो वरना चला जौंगा" "ऑनसाइट देने पर भी वापिस ना आ-उँगा "यह दुनिया चिंटू-ओ से भारी है" "सबको बस आगे बढ़ने की पड़ी है" "तुम ना करोगे तो किसी और से करा-उँगा" "तुम्हारी तरह एक और चिंटू बना-उँगा !!!!!!!!!!!

शर्मनाक

दिल्ली बलात्कार  की शर्मनाक घटना पर यह पंक्तियाँ  सारे वतन-पुरोधा चुप हैं कोई कहीं नहीं बोला लेकिन कोई ये ना समझे कोई खून नहीं खौला मेरी आँखों में पानी है सीने में चिंगारी है राजनीति ने कुर्बानी के दिल पर ठोकर मारी है सुनकर बलिदानी बेटों का धीरज डोल गया होगा मंगल पांडे फिर शोणित की भाषा बोल गया होगा सुनकर हिंद - महासागर की लहरें तड़प गई होंगी शायद बिस्मिल की गजलों की बहरें तड़प गई होंगी नीलगगन में कोई पुच्छल तारा टूट गया होगा अशफाकउल्ला की आँखों में लावा फूट गया होगा मातृभूमि पर मिटने वाला टोला भी रोया होगा इन्कलाब का गीत बसंती चोला भी रोया होगा चुपके-चुपके रोया होगा संगम-तीरथ का पानी आँसू-आँसू रोयी होगी धरती की चूनर धानी एक समंदर रोयी होगी भगतसिंह की कुर्बानी क्या ये ही सुनने की खातिर फाँसी झूले सेनानी जहाँ मरे आजाद पार्क के पत्ते खड़क गये होंगे कहीं स्वर्ग में शेखर जी के बाजू फड़क गये होंगे शायद पल दो पल को उनकी निद्रा भाग गयी होगी फिर पिस्तौल उठा लेने की इच्छा जाग गयी होगी!!!

सालामी

Column : Bhula Do Author :  Ankit Kumar Aggarwal इन भीगी हुई ऱाहो मे चलते हुए अभी सोचा मैने बह रहे है अश्क मेरे जाने हुआ ये कैसा इस जिंदगी मे हुए क्यूँ खफा सब शख्स मेरे जुदा होने का गुबार छुपाना भी आसान नही लेकिन छुपा कर भी होगा क्या हासिल मंज़िलो पे पहुचना भी है आसान अगर हो साथ मे किसी का साथ अकेले चलकर मुकाम पाने वालो को नही होती है वो खुशी नसीब खुशी तो है उसको जिसने किया दोस्तो के साथ सब हासिल खैर इन रस्तो की भी अपनी एक किस्मत है कोई इन पर चलकर रोता है तो कभी ये खुद किसी के लिए रोते है शायद आज!!!!!!!!! ये नादान मुझपे ही आँसू बहा रहा है कोई समझाओ इसे मैं अभी भी खुश ही हू ये तो असमा यूही मुझे सालामी देता है....

कुछ अनकहे लब्ज

Column  : Bhula Do Author :  Ankit Kumar Aggarwal 1 ) अरे आज़ादी की खुशी से हुआ मे वाकिफ़ आज इन हसीन नज़ारो को आँखों मे बसाना है. मंज़िल तो दूर ही है मुझसे लेकिन रास्ते का मज़ा उठना है काफिला शुरू से ही था अकेला लोग मिलकर बिछड़ते गये जो चलना चाहे साथ उसे लक्ष्य तक पहुचना है!!!! 2) दफ़न कर उस शख्स को जिसे तेरी परवाह नही, रख बस राख उसकी जिससे तुझे कोई गीला नही, आख़िर तेरा प्यार तो उसकी यादों मे है वो इंसान थी क्या ये तो तुझे अभी भी मालूम नही!!!!!! 3) मेरा फलसफा,,,,,,,,,,,, उन रस्तो से पूछो जिनपे मे चल था कभी उन अक्षरो से पूछो जिनको मेने कहा था कभी जाकर उन नग्मो से पूछो जिन्हे मे गुनगुनाता था कभी और अगर ये न्ही कर सकते तुम दोस्त तो उस आसमान से पूछो .................................................. जो रोकर सुना रहा है मेरे अल्फ़ाज़ अभी.... 4) तेरे लब्जों का रहता है इंतेजार मुझे चाहत मे तेरी हमेशा बेकरार रहे तुझको मानता प्यार की तस्वीर ये मन तस्वीर क्या तुझे अपनी तकदीर मानता हूँ जब निकले ये चाँदनी से नाहकर चाँद मे नही होता हैरान क्...

परख

Column  : Bhula Do Author :  Ankit Kumar Aggarwal परखते रहे वो हमे सारी ज़िंदगी, ओर हम इम्तिहान देते रहे, मज़ा आ रहा था उन्हे हमारी आँसुओ की बारिश मे, और हम भी उनके लिए बिना रुके रोते रहे, बेदर्द थे वो कुछ इस कदर, नींद हमारी उड़ाकर खुद चैन से सोते रहे, जिन्हे पाने के लिए हमने सब कुछ लूटा दिया, वो हमे हर कदम पर खोते रहे, ओर एक दिन जब हुआ इस का एहसास उन्हे, वो हमारे पास आकर पूरे दिन रोते रहे, ओर हम भी इतने ख़ुदग़र्ज़ निकले यारो, की आँखे बंद कर कफ़न मे सोते रहे.....!!!!! Column : Bhula Do Author : Ankit Kumar Aggarwal

जिंदगी

Column : Bhula Do Author : Ankit Kumar Aggarwal तुमको पता है लाश डूबती क्यूँ नही, क्यूँकी ए दोस्त डूबने क लिए भी जिंदगी चाहये.!!! मिली है जिंदगी तो इसकी इज्ज़त रखो खुद खुश रहो और सबको खुश रखो इबादत इजाज़त मे यकीन नही है तो क्या जिंदगी मे तो यकीन रखो कल मिले या ना मिले ये सूरज आज तो रोशनी का दामन साथ रखो!!! याद रखना मेरे दोस्त : होता है अपनी आँख का आँसू भी बेवफा,, वो भी निकलता है तो किसी और के लिए.. .. .

परवाह

Column : Bhula Do Author : Ankit Kumar Aggarwal परवाह मुझे है कितनी तुम्हारी मेरे अश्को से तुम जान लो हक़ीकत के हम्मसाए से निकली ये कैसी सी रंगत इसे तुम पहचान लो वो कैसी इबादत वो कैसी कशिश थी मुझसे जो मुझसे वो जुड़ा कर रही थी ना जाने किस रास्ते पे चल रहा था ये सख्श काश तुमने पहचाना होता ये अक्स आख़िर मे वोही एक रह गया बस पूछो ना जाने कैसे जी गया करता रहा वो सितम से दोस्ती ओर युहि परवाह करते करते मर गया !!!!!!

तेरी सोच

तेरे शहर तेरी सोच से निकल जाऊंगा, किसी उदास शाम में ढल जाऊंगा, तू जो मुकर गया है हर बात से अपनी, देख लेना एक दिन मैं भी बदल जाऊंगा, मत दिखा मुझ को अपना ये मासूम चेहरा, जब के तू जनता है में पिघल जाऊंगा, चाहे लाख तड़प लूं तेरे इंतज़ार में, मत लौट के आना मैं संभल जाऊंगा, तेरा होना इतना ज़रूरी तो नहीं है, मैं तो यादों के खिलोने से बेहल जाऊंगा। column : Bhula Do Author : Ankit Kumar Aggarwal

Letters still Pending

@Letters author : kamal bhatt  column  : kamal ki kalam se. blog :  Aangan Ke Geet जो औरों को लिखे ...सब गलत हाथों मे गए . । और खुद को जितनी भी चिट्ठीयां लिखी..एक भी नहीं मिली । !) ख्वाहिशें मरने को आ गई है.. अब भी प सुस्त ना हुई| 2)जिल्द भी चूहे कतर जाते है ..नेम चिट भी उल्टी चिपक गई है पन्ने भी पलटते .. गर तू इतनी मोटी ना होती रे... जिन्दगी ! तुझे अल्मारी में सहेज के रखा है के जिस रोज अनपड़ हो जाएगें तेरी भी सुनेंगे । 3)दाड़िम के पेड़ के किसी छेद मे छुपाकर रखी हैं अठन्नी गोल गोल बिल्कुल चांदी सी चमक रही है । अब इसको मिलाकर भी जिन्दगी ना मिले तो सौदे में घाटा ही होगा मुझको । 4)तेरी तस्वीर वालपेपर में थी जब.. शब लैप्टाप पर ही आंख लग जाती थी । 5) चिट्ठीए नि... दर्द फ़िराक वालिये | Sent Mails : 35 Inbox : 1 Drafts : 78 6) मुश्किल-ए-जिन्दगी कोयल गा रही थी.. मैं देख रहा था । 7)मै बातों के बीच के सन्नाटे मे व्यस्त था। और मुहं टपटपाने से जो आवाजें...कहते है कि बड़ी बड़ी बातें निकली... उन्हें सुनकर देर तक हंसा करते थे । 8)सिरे से पढ़ी.... एक एक खबर, चटखार...

Anonymous's Thoughts

author : kamal bhatt  column  : kamal ki kalam se. blog :  Aangan Ke Geet {जब मैने खुद इसे पढ़ा, समझ ही नहीं आया कि क्या कहना चाह रहा था। और विरोधाभास भी है बहुत जैसे पहले पहले स्नेह को व्यक्त करने से परहेज की जरूरत और फिर उसे व्यक्त करने की जरूरत । व्यक्त करने के तीन चरण है: १)लिखा जाना/बोला जाना।गाया जाना। २)किया जाना।  और ३)होना   } संगीत । पसन्द एक कारक हो सकता है जिसके आधार पे लोगो की गिनती की जा सकती है । खैर कुछ अस्पृश्य विचार आ रहे हैं और किसी के आग्रह पर इन्हे सेव कर लेता हूं। एक पन्ना लिखे जाने से पहले फाड़े जाने वाले उन सभी पन्नों का क्या जो लेखक के हिसाब से " मजा नहीं आ रहा" ।  जब भी कुछ सोचने की कोशिस करता हूं।  असली मुद्दे से भटक जाता हूं, दिमाग मेरे कन्ट्रोल मे नहीं है... । किस के है?  व्यक्ति की  हम पसन्द उसके बारे में बहुत कुछ बताती है । खैर बहुत क्या बताती है,जो भी हम पसन्द करते हैं.. वस्तुतः हम वही हैं । संगीत में क्यों किसी भी गीत के बोल उसे रुचिकर या अरुचिकर बनाने में बहुत महत्वपूर्ण  होते हैं ? Anon...

डू मी अ फ़ेवर ऐट्लीस्ट ।

author : kamal bhatt  column  : kamal ki kalam se. blog :  Aangan Ke Geet तुम पढ़ रहे हो क्या? तुम्हारे लिये ही लिखा था ! वैसे तो कितनी कहानी सुनी . अपनी है कोई नयी तो बता..!   नया... ! अबे कुछ नया बता,  उम्र इक वैरियबल है.. वैसे कौन्स्टैन्ट भी है.. मतलब  इक ऐसा वैरियेबल जो आपके द्वारा ऐक्सेसीबल नहीं है। "चटान कर रहा हूं " ( पिछले ‍६ महीनो मे हिन्दी के मेरे ज्ञान में इकमात्र शब्द जो ऐड हुआ है- ’ चटान ’) । पर नया क्या है सुनाने को । २२ वर्ष की उम्र तक आप अगर निकनेम्ड ’इन्साक्लोपीडीया’ हैं तो आप ऐसा सब कुछ कर चुके होते हैं जो आपको कभी रुचिकर प्रतीत  होता था । इक ऐसा मोड़ ,जहां किया जाना कुछ भी शेष नहीं रहता, चूंकी  प्राप्त किये जाने  लायक चीजों को चखकर देखो तो पता लगता है कि... खाना मिल जाने का तात्पर्य यह नहीं होता कि आपको भूख भी लगेगी... । नाट इन्ट्रेस्टेड के इतने उदाहरण है की कभी कभी लगता है ... तपस्या करने वाले उन सभी को हमसे ईर्ष्या करनी चाहिये । पर हम तो नाट इन्ट्रेस्टेड से भी ज्यादा बोर हैं.... देखो तो ;चेतना आते ही एक बच्चे क...

पाना क्षणिक है, होना चिरकालीन !

author : kamal bhatt  column  : kamal ki kalam se. blog :  Aangan Ke Geet हां अब ये भी होगा कि ,  सत्य कहना पड़ेगा  | वो नहीं जो हम जानते  , या चाहते है होना ,  बल्की वो जो   हम हैं  |  यकीनन हमें यू ही गले उतारना कठिन हो जाएगा ,  क्योंकी हम वो दिखना   बंद कर देंगे  ,  जो होने की हमसे अपेक्षा की जाती है !                  यह   अपने प्रति प्यार    है की आप जैसे हैं अपने को वैसा ही अपनाते हुए वो बनने   की कोशिस कर रहें है ,  जो आप होना चाहते हैं ! पाना क्षणिक है ,  होना   चिरकालीन ! यहां हमे डर है कि हम उन वस्तुओ या व्यक्तियों को खो देंगे   जिनसे हमारा लगाव है  |  पर हम खुद को समझा रहें होते है कि नहीं " ये तो मै   उसकी खुशी के लिये करता हूं" |  आनन्द सत्य में निहित है । ये कहना कि , '  मैं नही जानता कि मै क्या करना चाहता हूं  ',  इक झूठ है ! हम निर्णय से   ब...