सालामी


Column : Bhula Do
Author : Ankit Kumar Aggarwal


इन भीगी हुई ऱाहो मे चलते हुए अभी
सोचा मैने बह रहे है अश्क मेरे

जाने हुआ ये कैसा इस जिंदगी मे
हुए क्यूँ खफा सब शख्स मेरे

जुदा होने का गुबार छुपाना भी आसान नही
लेकिन छुपा कर भी होगा क्या हासिल

मंज़िलो पे पहुचना भी है आसान
अगर हो साथ मे किसी का साथ

अकेले चलकर मुकाम पाने वालो को
नही होती है वो खुशी नसीब
खुशी तो है उसको
जिसने किया दोस्तो के साथ सब हासिल

खैर इन रस्तो की भी
अपनी एक किस्मत है

कोई इन पर चलकर रोता है
तो कभी ये खुद किसी के लिए रोते है

शायद आज!!!!!!!!!
ये नादान मुझपे ही आँसू बहा रहा है

कोई समझाओ इसे मैं अभी भी खुश ही हू
ये तो असमा यूही मुझे सालामी देता है....


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1 comments:

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B.A.M.
admin
July 15, 2012 at 9:18 AM ×

I have heard it but in english... :P

Congrats bro B.A.M. you got PERTAMAX...! hehehehe...
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