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अप्रीत के प्रथम उत्तर....



AUTHOR : KAMAL BHATT
COLUMN : KAMAL KI KALAM SE...



उस बात का अर्थ , जिसे तुम अपनी कलम में लिये रखते हो..
सुरंग की सुर लहरियों सी हर शाम देर तक गूंजती रहती हैं....तुम्हरा अन्त:स्थल जो मुझे खुद में समेट लेना चाहता है..जो मुझे मेरी तरह देखना चाहता है...जो मेरी आकांक्षाओ का लालची अधिकारी नहीं....मेरी उच्चतम क्षमता का अभिलाषी है.....जो गुण अवगुण के तराजू पर हर पल डोलते मन को छोड़ अन्तत: कर्तव्य के पथ पे अग्रणी रहा है..
मेरा मन अबूझ था......" स्वनिर्धारित जीवन मेरे अपने निर्णय को कहां स्वीकार कर पाएगा "
अपनी पूर्वनिर्धारणा मे प्रेम से वह अपेक्षा करना मेरी भूल थी..किंतु मेरा अपराध नहीं....
और फिर तुम भी कहते हो के अस्तित्व अंनत है....
और  सीमाएं परिभाषाएं तोड़ देंगी ....
जब इस छोटे सफ़र का १ लम्बा अंत होगा....
अंनत कहूंगी तो फिर सोचना शुरू कर दोगे.....
मैने कलम तोड़ देनी है.....
तुमने न जाने क्या क्या......

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