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Showing posts from December, 2012

Where are you?

वहा की धूप भी अच्छी लगती थी यहा के एसी मे भी आराम नही…… वहा घास पे बैठना भी अछा लगता था यहा चयर्स पे भी चैन नही…… वहा के समोसे भी स्वादिष्ट थे यहा के बर्गर मे भी स्वाद नही….. वहा की चाय भी मीठी लगती थी यहा की आइस टी मे भी मिठास नही….. वो ब्लू यूनिफॉर्म मे एक कॉन्फिडेन्स था आज जीन्स मे भी कंफर्ट नही….. वो ब्लॅक शूस मे जो बात थी वो आज अडीडस और नाइकी मे नही….. कॉलेज बस की आखरी सीट पे बैठ के गये हुए गानो की जैसे अब धुन भी याद नही….. अब बस सामने एक कंप्यूटर स्क्रीन है और हस्ने लायक कोई मज़ाक नही….. फॅकल्टी से लड़ते वक़्त ये पता भी न था की मॅनेजर के सामने कुछ बोल भी ना पाएँगे….. अब तो ये भी नही पता होता की ह्म वापस घर क्ब जाएँगे….. एक झूठी मुस्कुराहट लिए ह्म जैसे जी रहे है…. ज़िंदगी का कोई भी गम हो ओफीस के काम के साथ पी रहे है….. सुबह का एक मेसेज “आज नही चलते यार”…. अब “इट्स 9.30 Where are you?” मे बदल गया है….. पहले जिस हस्ती को लगभग पूरा कॉलेज जानता था…. आज वो एक क्यूबिकल मे सिमट के रह गया है….. पहले एक दूसरे की पार्टी मे जैसे बिल बढ़ाने जाते थे….. आज की पा...

चिंटू की लाइफ !!!

परेशान थी चिंटू की वाइफ नों-हॅपनिंग थी जो उसकी लाइफ चिंटू को ना मिलता था आराम ऑफीस मैं करता काम ही काम चिंटू के बॉस भी थे बड़े कूल प्रमोशन को हर बार जाते थे भूल पर भूलते नही थे वो डेडलाइन काम तो करवाते थे रोज़ टिल नाइन चिंटू भी बन ना चाहता था बेस्ट इसलिए तो वो नही करता था रेस्ट दिन रात करता वो बॉस की गुलामी ऑनसाइट के उम्मीद मैं देता सलामी दिन गुज़रे और गुज़रे फिर साल बुरा होता गया चिंटू का हाल चिंटू को अब कुछ याद ना रहता था ग़लती से बीवी को बहेनजी कहता था आख़िर एक दिन चिंटू को समझ आया और छोड़ दी उसने ऑनसाइट की मोह माया बॉस से बोला, "तुम क्यों सताते हो ?" "ऑनसाइट के लड्डू से बुड्दू बनाते हो" "प्रमोशन दो वरना चला जौंगा" "ऑनसाइट देने पर भी वापिस ना आ-उँगा "यह दुनिया चिंटू-ओ से भारी है" "सबको बस आगे बढ़ने की पड़ी है" "तुम ना करोगे तो किसी और से करा-उँगा" "तुम्हारी तरह एक और चिंटू बना-उँगा !!!!!!!!!!!

शर्मनाक

दिल्ली बलात्कार  की शर्मनाक घटना पर यह पंक्तियाँ  सारे वतन-पुरोधा चुप हैं कोई कहीं नहीं बोला लेकिन कोई ये ना समझे कोई खून नहीं खौला मेरी आँखों में पानी है सीने में चिंगारी है राजनीति ने कुर्बानी के दिल पर ठोकर मारी है सुनकर बलिदानी बेटों का धीरज डोल गया होगा मंगल पांडे फिर शोणित की भाषा बोल गया होगा सुनकर हिंद - महासागर की लहरें तड़प गई होंगी शायद बिस्मिल की गजलों की बहरें तड़प गई होंगी नीलगगन में कोई पुच्छल तारा टूट गया होगा अशफाकउल्ला की आँखों में लावा फूट गया होगा मातृभूमि पर मिटने वाला टोला भी रोया होगा इन्कलाब का गीत बसंती चोला भी रोया होगा चुपके-चुपके रोया होगा संगम-तीरथ का पानी आँसू-आँसू रोयी होगी धरती की चूनर धानी एक समंदर रोयी होगी भगतसिंह की कुर्बानी क्या ये ही सुनने की खातिर फाँसी झूले सेनानी जहाँ मरे आजाद पार्क के पत्ते खड़क गये होंगे कहीं स्वर्ग में शेखर जी के बाजू फड़क गये होंगे शायद पल दो पल को उनकी निद्रा भाग गयी होगी फिर पिस्तौल उठा लेने की इच्छा जाग गयी होगी!!!

The HOBBIT : An Unexpected Journey - Review

                                   "In a hole in the ground there lived a hobbit."   The New Zealand screenwriter Peter Jackson, who followed up the   Lord of the Rings   trilogy with   King Kong   and   The Lovely Bones , has returned to his old hobbits, and in collaboration with Fran Walsh, Philippa Boyens and Guillermo del Toro, has turned the initially modest   The Hobbit   into a full-scale trilogy of its own. Given three films, each presumably close to three hours long, Jackson and co. have plenty of time on their hands, and 20 minutes of the film has passed before the immortal "In a hole in the ground there lived a hobbit" is spoken. What we get at first is a back story from a posthumously published Tolkien work explaining how a blight fell on the underground city of Erebor when fire-breathing dragons, hungry for gold, attacked it, driving ...